
अफगानिस्तान की हिंदू प्राचीनता
Deprecated: preg_split(): Passing null to parameter #3 ($limit) of type int is deprecated in /var/www/9d3b87cf-5635-42c8-8024-fd11b68e14cb/public_html/wp-content/themes/jannah/framework/functions/post-functions.php on line 805
अफगानिस्तान की हिंदू विरासत: सनातन धर्म का पौराणिक इतिहास
इंदरजीत सिंह, यूके से
अफगानिस्तान का नाम सुनते ही ज्यादातर लोग एक मुस्लिम देश की कल्पना करते हैं, लेकिन यहां हिंदू धर्म की गहरी और प्राचीन जड़ें हैं। सनातन धर्म हजारों वर्षों से अफगानिस्तान की धरती पर फला-फूला है। यह विरासत अरब और फारसी आक्रमणाओं से पहले की है, जब हिंदू और सिख समुदायों ने इस क्षेत्र में अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बनाई।
1990 के दशक की शुरुआत में मानु लाल जैसे कई हिंदू और सिख परिवार अफगानिस्तान छोड़कर अन्य देशों में शरण लेने को मजबूर हुए। उनके लिए यह न केवल एक नई शुरुआत थी, बल्कि हजारों वर्षों की हिंदू परंपराओं को पीछे छोड़ने का दर्द भी था। तालिबान के सख्त नियमों, युद्ध और अशांति के कारण अफगान हिन्दू समुदाय अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता रहा। पूर्व में कंधार जैसे छोटे शहरों में हजारों हिंदू रहते थे जिनके पास कई भव्य मंदिर थे। शिव-पार्वती, देवी माता, सत्यनारायण और कई अन्य देवताओं के मंदिर यहां मौजूद थे।
इतिहासकार ह्युएन त्सांग ने 7वीं सदी में अफगानिस्तान के निकट के क्षेत्रों में पहुंचकर बताया कि वहां के शासक क्षत्रिय थे और हिन्दू धर्म का प्रभाव व्यापक था। ज़ुनबिल वंश ने 9वीं सदी तक अरब और फारसी आक्रमणों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया था और हिंदू धर्म की परंपराएं मौजूद रहीं। इस वंश ने सूर्य देवता ज़ुन की पूजा की, जो मुख्य रूप से हिंदू थी।
1960 के दशक में काबुल के पास अनेक प्राचीन मूर्तियां और मंदिरों के अवशेष मिले, जो इस क्षेत्र में हिंदू धार्मिक जीवन की गवाह हैं। इनमें श्री गणेश और शिवलिंग की मार्बल की मूर्तियां भी शामिल हैं। 10वीं शताब्दी के भूगोल ग्रंथ “हुदूद अल-अलम” में अफगानिस्तान के विभिन्न शहरों जैसे कंधार, काबुल और ननहर के हिंदू उपस्थिति के साक्ष्य मिलते हैं। यहां के मंदिरों में सोने-चांदी के मूर्तियां और ब्राह्मण मौजूद थे।
हिंदू शाही वंश ने 9वीं से 11वीं सदी तक इस क्षेत्र में शासन किया, जिसके बाद महमूद गजनी के अधीन हिंदुओं को धर्मनिरपेक्ष अधिकार मिलने लगे। गजनी काल में हिंदू सामुदायिक नेता और सैनिक पदों पर थे, जिससे सामाजिक समावेशन का संकेत मिलता है।
13वीं से 15वीं शताब्दी में मंगोल और तैमूर के आक्रमणों के बावजूद हिंदू समुदाय ने अपनी परंपरा को जीवित रखा। मुग़ल काल में भी अफगानिस्तान का पूर्वी भाग हिन्दू संस्कृति और व्यापार का केन्द्र था। गुरु नानक ने 16वीं सदी में अफगानिस्तान का दौरा किया और किंवदंतियों के अनुसार कुछ हिंदू उनके अनुयायी बने, जिन्हें ‘नानकपन्थी’ कहा गया।
18वीं और 19वीं सदी में अफगानिस्तान के हिंदू अपने पेशेवर, व्यापारी और शैक्षिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे थे। कुमार निशांत से लेकर मोहन लाल और अलेक्जेंडर बर्न्स जैसे यात्रियों ने हिंदू बहुलता और उनकी सामाजिक स्थिति पर मूल्यांकन किया। हिंदू डॉक्टर, शिक्षक और व्यापारी इस काल में शहरों और गाँवों में सक्रिय थे।
70 के दशक में अफगान सरकार ने मंदिरों का पुनर्निर्माण किया, परंतु 1990 के दशक की शुरुआत में गृहयुद्ध और तालिबान के कड़े शासनों के कारण हिंदू और सिख समुदाय भारी दबाव में आ गए। तब से कम होती आबादी और मंदिरों पर कब्जे से यह विरासत संकट में है। 2020 के दशक में भी अफगानिस्तान में हिंदुओं की संख्या शतकों से कम रह गई है, लेकिन समुदाय के कुछ सदस्य अपनी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं।
हालांकि अफगानिस्तान के हिंदू अब दुनिया के कई हिस्सों में प्रवास कर बसे हैं, जिनके वहाँ मंदिर और सांस्कृतिक केंद्र स्थापित हैं, लेकिन उनकी मातृभूमि में उनकी प्राचीन धार्मिक विरासत की महत्ता सदाबहार है। वर्तमान में अफगान सरकार के कुछ समर्थन के कारण हिंदू समुदाय की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आ रहा है और कुछ परिवार अपनी जड़ों से जुड़ने व देश में लौटने की सोच रहे हैं।
यह इतिहास अफगान हिंदुओं की सहिष्णुता, संघर्ष और संस्कृति की अनूठी धरोहर को उजागर करता है, जो आज भी विश्व सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है।



