
रिहायशी डॉक्टरों के लिए कार्य घंटे सीमित करें, आराम सुनिश्चित करने की सिफारिश – संसदीय समिति
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नई दिल्ली: संसदीय समिति ने अपने ताजा रिपोर्ट में सरकार से अनुरोध किया है कि वह “क्लिनिकल ड्यूटी आवर्स रेगुलेशन” नामक एक औपचारिक नीति को लागू करे और इसे सख्ती से पालन सुनिश्चित करे। समिति ने यह कहा है कि चिकित्सकीय ड्यूटी के घंटे निर्धारित किए जाएं और डॉक्टरों को पर्याप्त आराम दिया जाए ताकि उनकी सेहत और कार्यक्षमता बनी रहे।
इस रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ड्यूटी रॉस्टर की निगरानी के लिए कड़ा तंत्र बनाना अनिवार्य है, ताकि डॉक्टरों के काम के घंटे निर्धारित लिमिटों के बाहर न जाएं। आयोग ने बार-बार ये समस्या उठाई है कि बिना नियमित आराम के लगातार काम करने से डॉक्टरों की सेहत प्रभावित होती है, जिससे मरीजों की सेवा भी बाधित हो सकती है।
संसदीय समिति ने यह सुझाव दिया है कि सरकार कुछ स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए, जिसमें डॉक्टरों के लिए निश्चित विश्राम अवधि निर्धारित हों एवं उनकी ड्यूटी शिफ्टों की निगरानी के लिए ऑडिट व्यवस्था हो। इसके अलावा, किसी भी उल्लंघन की स्थिति में सख्त कार्रवाई भी आवश्यक है ताकि सभी अस्पताल और मेडिकल संस्थान नियमों का पालन करें।
समिति का कहना है कि इस तरह की नीतियां न केवल रिहायशी डॉक्टरों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएंगी बल्कि मरीजों को भी उच्च गुणवत्ता की चिकित्सा सेवा प्रदान करने में मदद करेंगी। उन्होंने जोर दिया कि डॉक्टरों को उनकी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और तरोताजा रहना आवश्यक है, जिसके लिए पर्याप्त आराम अनिवार्य है।
अस्पतालों में लगातार लंबे समय तक कार्य करना डॉक्टरों की थकान, तनाव और चिकित्सकीय त्रुटियों को बढ़ावा देता है। समिति ने यह भी सुझाया है कि इसके लिए सरकार को नियमित रूप से समीक्षा करनी चाहिए और कार्य प्रणाली में सुधार करते रहना चाहिए।
इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि संसद की एक महत्वपूर्ण समिति चिकित्सकीय क्षेत्र के कर्मचारियों की भलाई के प्रति गंभीर है और वे चाहते हैं कि सरकारी स्तर से ऐसी नीतियों को लागू कर, डॉक्टरों के अधिकारों का संरक्षण हो। स्वास्थ्य सेवाओं का बेहतर संचालन तभी संभव है जब फ्रंटलाइन कर्मचारियों के काम के माहौल में सुधार किया जाए।
सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम उल्लेखनीय होंगे और अगर यह नीति प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो भारत के स्वास्थ्य तंत्र को बल मिलेगा। इसके साथ ही डॉक्टरों की नौकरी से जुड़े तनाव और ओवरवर्क के खतरे कम होंगे, जिससे कुल मिलाकर चिकित्सा क्षेत्र में सुधार आएगा।



