
भारत को सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाने की जरूरत
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नई दिल्ली, 27 अप्रैल। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वर्तमान में “आशा” कार्यकर्ता जिन्होंने गाँव-गाँव पहुंचकर स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया है, उनकी कामयाबी के बाद एक नए कदम के तौर पर समाज में पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता “अशोक” की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि महिला केंद्रित मॉडल के साथ-साथ पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को और प्रभावी बनाएगी। “अशोक” जैसे पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता विशेषतः पुरुष और युवाओं की स्वास्थ्य समस्याओं को बेहतर ढंग से समझाकर समाधान प्रदान कर सकेंगे, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएँ भी कम होंगी।
एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया, “जहाँ महिलाओं की देखभाल के लिए आशा कार्यकर्ता सक्रिय हैं, वहाँ पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वे पुरुषों तक स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता पहुंचाने और उनकी समस्याओं को समझने में मदद करेंगे।”इस कदम से टबरकुलोसिस, पुरुषों में बढ़ रहे मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे, एवं नशे की लत जैसे विषयों पर बेहतर कार्य हो सकेगा।
सरकार ने भी इस विचार का समर्थन किया है और पायलट परियोजनाओं के माध्यम से कुछ जिलों में ‘अशोक’ कार्यकर्ता नियुक्त करने की योजना बनाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह मॉडल सफल रहा, तो पूरे देश में इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा।
सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक समावेशी बनाने के लिए यह रणनीति समय की मांग है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की स्वास्थ्य समस्याओं का सही तरीके से समाधान निकालने के लिए ‘अशोक’ जैसे पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता आवश्यक हैं। यह पहल न केवल स्वास्थ्य सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण होगी, बल्कि सामाजिक ढांचे में भी सकारात्मक बदलाव लाएगी।
अंततः, भारत को अपनी स्वास्थ्य प्रणाली को और मजबूत बनाने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाने की जरूरत है, साथ ही नए आयाम जोड़ते हुए महिला और पुरुष दोनों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।



