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छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक सफलता: राजनांदगांव रेंज माओवाद मुक्त


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कांकेर में 5 नक्सलियों का आत्मसमर्पण, 36 साल पुराने लाल आतंक का अंत

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों से एक बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। लंबे समय से माओवाद की समस्या से जूझ रहे राजनांदगांव पुलिस रेंज को अब पूरी तरह माओवाद मुक्त घोषित कर दिया गया है। यह उपलब्धि निर्धारित समय सीमा से पहले हासिल की गई, जो सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। इस सफलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कांकेर जिले में पांच सक्रिय माओवादियों के आत्मसमर्पण ने निभाई है, जिन्होंने हथियारों के साथ सरेंडर कर दिया।


आत्मसमर्पण से टूटा नक्सल नेटवर्क

कांकेर जिले में राजनांदगांव-कांकेर बॉर्डर (आरकेबी) डिवीजन के पांच प्रमुख माओवादी कैडर ने आत्मसमर्पण किया। इनमें एरिया कमेटी मेंबर (ACM) स्तर के माओवादी शामिल हैं, जिनकी पहचान मंगेश पोडियमी, गणेश वीके, मंगती जुर्री, हिडमे मरकाम उर्फ सुनीता और राजे के रूप में हुई है।

इन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण के दौरान एक एसएलआर और दो .303 रायफल भी जमा कराई हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ये सभी लंबे समय से सक्रिय थे और इनकी तलाश कई महीनों से की जा रही थी। इनका आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि माओवादी संगठन अब इस क्षेत्र में पूरी तरह कमजोर पड़ चुका है।


पहले ही कमजोर हो चुका था माओवादी ढांचा

राजनांदगांव पुलिस रेंज में शामिल जिलों—राजनांदगांव, खैरागढ़ और कवर्धा—को पहले ही जनवरी 2026 में माओवाद से मुक्त घोषित किया जा चुका था। इसके बाद सुरक्षा बलों का ध्यान मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी (एमएमएसी) और कांकेर सीमा क्षेत्र पर केंद्रित किया गया था, जो माओवादियों के अंतिम ठिकाने माने जा रहे थे।

13 अगस्त 2025 को एमएमएसी जिले के बांदा पहाड़ में हुई मुठभेड़ ने माओवादियों की कमर तोड़ दी थी। इस एनकाउंटर में सेंट्रल कमेटी मेंबर विजय रेड्डी और डिविजनल कमेटी मेंबर लोकेश सलामे मारे गए थे। इस घटना के बाद माओवादी संगठन बिखरने लगा और उसके कैडर धीरे-धीरे छिपने या आत्मसमर्पण करने लगे।


15 मार्च की मुठभेड़ ने दिए स्पष्ट संकेत

15 मार्च 2026 को संयुक्त सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच एक अहम मुठभेड़ हुई थी। इस दौरान माओवादी अपना सामान छोड़कर भाग गए थे। घटनास्थल से सुरक्षा बलों को एक बंदूक, 15 जिंदा कारतूस और अन्य सामग्री बरामद हुई थी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वहां से एक पत्र भी मिला था, जिसमें माओवादी कैडर ने अपने शीर्ष नेतृत्व से आत्मसमर्पण को लेकर मार्गदर्शन मांगा था। इस पत्र ने यह साफ कर दिया था कि संगठन के भीतर मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और कैडर अब हथियार छोड़ने की तैयारी में हैं।


36 साल का लाल आतंक: एक इतिहास

इस क्षेत्र में माओवाद की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रेरित होकर यह विचारधारा धीरे-धीरे तेलंगाना और बस्तर के रास्ते छत्तीसगढ़ के इन इलाकों तक पहुंची। “जल, जंगल और जमीन” के नाम पर शुरू हुआ यह आंदोलन समय के साथ हिंसक रूप लेता गया।

मोहला, मानपुर और औंधी जैसे क्षेत्र माओवादियों के गढ़ बन गए थे। इन इलाकों में कई बड़ी हिंसक घटनाएं हुईं, जिनमें सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक 2009 में मानपुर के कोरकोट्टी इलाके में हुई थी, जहां माओवादियों के एंबुश में पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे सहित 29 जवान शहीद हो गए थे। यह घटना लंबे समय तक इस क्षेत्र में माओवाद की भयावहता का प्रतीक बनी रही।


सुरक्षा बलों की रणनीति और लगातार अभियान

माओवाद के खिलाफ लड़ाई में राज्य पुलिस, सीआरपीएफ और आईटीबीपी जैसे सुरक्षा बलों ने मिलकर संयुक्त अभियान चलाया। खुफिया जानकारी के आधार पर सर्च ऑपरेशन, लगातार गश्त और स्थानीय लोगों के सहयोग से माओवादियों के नेटवर्क को धीरे-धीरे खत्म किया गया।

सुरक्षा बलों ने न केवल मुठभेड़ों के जरिए माओवादियों को कमजोर किया, बल्कि आत्मसमर्पण नीति के जरिए उन्हें मुख्यधारा में लौटने का अवसर भी दिया। इसी रणनीति का परिणाम है कि आज इस क्षेत्र में माओवादी गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं।


अधिकारियों का बयान

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के पुलिस अधीक्षक यशपाल सिंह ने इस सफलता की पुष्टि करते हुए कहा कि आरकेबी डिवीजन के अंतिम सक्रिय पांच माओवादी सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि इनके दो साथी पहले ही संगठन छोड़ चुके हैं।

उनके अनुसार अब यह पूरा क्षेत्र पूरी तरह माओवाद प्रभाव से मुक्त हो चुका है, जो सुरक्षा बलों और प्रशासन के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।


विकास के नए रास्ते खुलेंगे

माओवाद के खत्म होने से अब इस क्षेत्र में विकास कार्यों को नई गति मिलने की उम्मीद है। लंबे समय तक नक्सल प्रभाव के कारण यहां सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी योजनाएं प्रभावित होती रही थीं।

अब प्रशासन इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने, निवेश बढ़ाने और स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित करेगा। इससे न केवल क्षेत्र का विकास होगा, बल्कि लोगों का जीवन स्तर भी बेहतर होगा।


निष्कर्ष: शांति और विकास की ओर बढ़ता कदम

राजनांदगांव पुलिस रेंज का माओवाद मुक्त होना केवल एक सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 36 वर्षों तक चले लाल आतंक के अंत के साथ अब इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है।


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