धर्म / ज्योतिष

मूंगफली उत्सव, कोई है क्या?


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बेंगलुरु में दो दशकों से चलता आ रहा कडलाकै पारीशे: एक अनोखा मूंगफली मेला

बेंगलुरु, भारत – कडलाकै पारीशे, जो कि कन्नड़ भाषा में मूंगफली मेला कहलाता है, शहर के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का एक अहम हिस्सा है। यह उत्सव हर वर्ष कार्तिक महीने के अंतिम सोमवार को बासवनगुडी के प्रसिद्ध डोड्डा बसवना मंदिर के आसपास बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पांच सौ सालों से किसान और श्रद्धालु इस दिन अपनी पहली मूंगफली की पैदावार को भगवान नंदी को अर्पित करते हैं, जो शिवजी के गाड़ी के रूप में पूजे जाते हैं।

बासवनगुडी के इस मंदिर में स्थापित विशाल नंदी की मूर्ति, जो ग्रेनाइट से निर्मित है, अकेली ऐसी मूर्ति है जो स्वयं नंदी को ही मुख्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित करती है। इसकी ऊंचाई लगभग पंद्रह फुट और लंबाई बीस फुट से भी अधिक है। स्थानीय परंपरा और प्राचीन कथाओं के अनुसार, इस क्षेत्र में पहले खेत थे, जहाँ मूंगफली की खेती होती थी, और कई सदियों पहले एक बिचित्र बैल पूर्णिमा की रातों में कपटपूर्ण रूप से फसलों को नष्ट करता था। जब ग्रामीणों ने उसे पकड़ने की कोशिश की, तो वह पत्थर में बदल गया। तब से उस पत्थर को मूर्ति के रूप में पूजा जाने लगी और कडलाकै पारीशे की परंपरा शुरू हुई।

मेले के दौरान न केवल मूंगफली बल्कि कई प्रकार के स्थानीय उत्पाद, जैसे कि गुड़, फुलझड़ी, फूलों की माला, और हस्तशिल्प वस्तुएं भी बिक्री पर मिलती हैं। बाजार में कड़ाके की भीड़ जुटती है, जो सभी आयु वर्ग के लोगों को आकर्षित करती है। परम्परागत व्यंजन जैसे डोसा, इडली, और रस गोले मेले के स्वाद को और भी बढ़ा देते हैं।

यह मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि एक सामाजिक उत्सव की तरह भी देखा जाता है जहाँ लोग एक साथ मिलते हैं, स्थानीय संस्कृति का आनंद लेते हैं और परंपराओं को जीवित रखते हैं। इस त्योहार के दौरान मंदिर और आस-पास के इलाके को रंग-बिरंगी रोशनी, झंडियां और फूलों से सजाया जाता है। पुरोहित विशेष पूजा और भेंट के आयोजन करते हैं, जिसमें मूंगफली को आध्यात्मिक रूप से भगवान को अर्पित किया जाता है।

अक्सर लोग यह जानना चाहते हैं कि इस मंदिर में विष्णु या महादेव की बजाय नंदी को मुख्य देवता क्यों माना जाता है। यहां के पुरोहित बताते हैं कि नंदी देवता स्वयं शिव के वाहक होने के साथ-साथ इस क्षेत्र के संरक्षक भी हैं, और यह मंदिर नंदी को समर्पित एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ वे स्वयं मुख्य देवता के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान श्रद्धालुओं को अध्यात्मिक शक्ति और स्थिरता का एहसास कराता है।

स्थिति ऐसी है कि बदलते समय, तकनीकी युग तथा शहर की आधुनिकता के बीच यह प्राचीन परंपरा जीवित है और उसे नई पीढ़ी के लोगों तक भी पहुंचाया जा रहा है। मेले में भाग लेने वाले किसानों ने बताया कि वे मोबाइल भुगतान और QR कोड के जुड़ाव के माध्यम से परंपरा और आधुनिकता का संगम देख रहे हैं।

इस प्रकार, कडलाकै पारीशे न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि बेंगलुरु के सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग भी है। यह वार्षिक मूंगफली मेले स्थानीय लोगों के जीवन में बहुत खास महत्व रखता है और शहर के तेज़ जीवन में विरासत और यादों की एक सजीव कड़ी के रूप में खड़ा है।


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