
दुर्लभ रोग निधि में गिरावट, प्रमुख केंद्रों में अष्टव्यय निधि का जमाव
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नई दिल्ली। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के कई प्रमुख मेडिकल संस्थानों में दुर्लभ रोगों के लिए जारी की गई निधियों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) दिल्ली, महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (MAMC), पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) चंडीगढ़ और संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) लखनऊ जैसे संस्थानों में प्राप्त ताजा आवंटन की तुलना में पिछले वित्तीय वर्ष के शेष न खर्च हुए फंड्स को आगे बढ़ाने का मामला सामने आया है।
सरकार के ताजा आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इन संस्थानों ने नए फंड्स प्राप्त करने के बजाय, पहले के शेष फंड्स को ही वित्तीय वर्ष के अंत तक उपयोग में लाने की प्रक्रिया अपनाई है। इसका मतलब यह है कि दुर्लभ रोगों के इलाज और शोध में जरूरी आर्थिक संसाधन अपेक्षित गति से खर्च नहीं हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दुर्लभ रोगों के इलाज हेतु धन का प्रभावशाली उपयोग न होना मरीजों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि ये रोग विशेष उपचार की मांग करते हैं और इनके लिए लगातार अनुसंधान की आवश्यकता होती है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए संसाधनों का अभाव और उनका सही उपयोग सुनिश्चित किए बिना, रोगियों तक बेहतर सुविधाएं पहुंचाना मुश्किल होगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब ऐसे केंद्रों में वित्तीय संसाधनों का सदुपयोग नहीं हो पाता, तो यह संकेत है कि प्रबंधन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कुछ खामियां हैं। फंड के अप्रयुक्त रह जाने से न केवल इलाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि शोध गतिविधियों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों को चाहिए कि वे इन संस्थानों की फंडिंग प्रक्रिया की जांच करें तथा सुनिश्चित करें कि आगामी वित्तीय वर्षों में आवंटित धन का पूरा और प्रभावी उपयोग हो। इससे दुर्लभ रोगों के प्रति इलाज और शोध कार्यों में गति आएगी और मरीजों को बेहतर समर्थन मिलेगा।
हालांकि सरकार ने दुर्लभ रोगों के लिए योजनाएं चलाई हैं और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई है, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों को देख कर यह कहा जा सकता है कि सुधार की आवश्यकता है ताकि निधियों का सही समय पर उपयोग हो सके। इसके साथ ही, संस्थानों को भी अपने वित्तीय प्रबंधन और योजना बनावट में पारदर्शिता लानी होगी ताकि संसाधनों का उचित लाभ मरीज और शोध दोनों को मिले।
अंत में, दुर्लभ रोगों के खिलाफ लड़ाई में संस्थागत दक्षता और सही आर्थिक प्रबंधन प्रमुख हथियार हैं। यदि निधि संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है, तो ही मरीजों को आवश्यक सुविधाएं और उपचार मिल पाएंगे, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार होगा।



