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इन्फ्लुएंसर्स में भारत के प्रोटीन आवश्यकताओं पर मतभेद


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नई दिल्ली। भारत में प्रोटीन सेवन को लेकर मतभेद और बहस तेज होती जा रही है। इस मुद्दे पर प्रसिद्ध पोषण विशेषज्ञ रुजुता दिवेकर के बयान ने स्वास्थ्य समुदाय को दो भागों में बाँट दिया है। कुछ विशेषज्ञ उनकी सलाह का समर्थन कर रहे हैं, तो वहीं कई अन्य पोषण विशेषज्ञ उनसे असहमत हैं।

रुजुता दिवेकर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि भारत में प्रोटीन की आवश्यकता को लेकर समाज में एक बड़ी भ्रांति है। उनका मानना है कि आम भारतीय की दैनिक आहार में प्रोटीन की मात्रा पर्याप्त है और जितना चिंता जताई जाती है, वह शायद ज़रूरी नहीं। दिवेकर ने यह भी कहा कि प्राकृतिक और संतुलित भोजन से ही बेहतर पोषण मिल सकता है, न कि महंगे सप्लीमेंट या पॉवर फ़ूड से।

हालांकि, इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कई पोषण विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में प्रोटीन की कमी अभी भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। वे मानते हैं कि देश के कई हिस्सों में लोग अभी भी अपनी जिंदगी के लिए आवश्यक प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं, जिससे कुपोषण, विकास में बाधा और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। उनके अनुसार, रुजुता दिवेकर का नजरिया उन क्षेत्रों की वास्तविकता को नजरअंदाज करता है जहां प्रोटीन की कमी है।

इस बहस ने सोशल मीडिया पर भी खूब हलचल मचा रखी है। कई युवा पोषण विशेषज्ञ और फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स दोनों पक्षों के तर्कों का समर्थन करते हुए अपनी राय रख रहे हैं। कुछ ने युवाओं को सचेत किया है कि वे प्लांट-बेस्ड प्रोटीन, जैसे दालें, राजमा, चना आदि का सेवन बढ़ाएं, जबकि कुछ ने पशु-आधारित प्रोटीन की आवश्यकता पर जोर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विविधता और आहार संबंधी रीतियों को ध्यान में रखते हुए प्रोटीन की जरूरतें भी विभिन्न हो सकती हैं। पंजाब, तमिलनाडु, केरल जैसे इलाकों में मांसाहार अधिक प्रचलित है, वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के कई भागों में शाकाहारी भोजन प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर पोषण संबंधी नीति बनाने में भी चुनौतियां सामने आती हैं।

सरकारी रिपोर्टों के अनुसार भारत में अभी भी लगभग 40% बच्चे और 20% वयस्क प्रोटीन की कमी से प्रभावित हैं। इसलिए, सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण और गरीब तबकों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना है। साथ ही पोषण जागरूकता फैलाने के लिए अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

परन्तु रुजुता दिवेकर के इस विवादास्पद बयान से यह साफ है कि प्रोटीन को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन वास्तविक स्थिति पर बात करना भी जरूरी है। विशेषज्ञ आम जनता से आग्रह कर रहे हैं कि वे अपने स्थानीय आहार विशेषज्ञ और डॉक्टरों की सलाह अवश्य लें और फॉल्स प्रचारों से बचें।

अंत में यह कहा जा सकता है कि भारत में प्रोटीन की उपलब्धता और सेवन दोनों पर संतुलित और तथ्यात्मक चर्चा आवश्यक है ताकि सही दिशा में कदम उठाए जा सकें और सार्वजनिक स्वास्थ्य बेहतर हो सके।


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