
पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ने उर्वरक इकाइयों के लिए स्पॉट मार्केट से $19 प्रति यूनिट प्राकृतिक गैस खरीदी
Deprecated: preg_split(): Passing null to parameter #3 ($limit) of type int is deprecated in /var/www/9d3b87cf-5635-42c8-8024-fd11b68e14cb/public_html/wp-content/themes/jannah/framework/functions/post-functions.php on line 805
नई दिल्ली: भारत सरकार के अधिकारियों के अनुसार, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), अमोनिया, और सल्फर सहित कच्चे माल की कीमतों में हाल ही में तेज़ वृद्धि देखी गई है। इसके साथ ही, माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की लागत में भी अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है, जिससे उर्वरक उद्योग सहित कई क्षेत्रों पर दबाव पड़ा है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण वैश्विक स्तर पर गैस और रासायनिक पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जिससे आयात पर निर्भर भारत को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक प्राकृतिक गैस की कीमतें उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं, जो किसान उत्पादकता व खाद की कीमतों पर असर डाल सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन मूल्यवृद्धियों के पीछे मुख्य कारण परिवहन संपर्कों में रुकावटें और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता हैं। ‘‘लॉजिस्टिक्स लागत ने कुल उत्पादन लागत में अप्रत्याशित रूप से इजाफा किया है,” एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार बाजार की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए आपूर्ति श्रृंखला को सुचारू बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
इसके अलावा, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भी इस बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने सुझाव दिया कि दीर्घकालिक टिकाऊ समाधान के लिए अर्ध-आधुनिक ऊर्जा स्रोतों और घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ावा देना आवश्यक है। इससे भारत की निर्भरता कम होगी और उर्वरक उत्पादन में स्थिरता आएगी।
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष में भी उर्वरक निर्माण में इनपुट लागतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई थी। वर्तमान में आई मूल्य वृद्धि से किसानों के लिए खाद की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी जटिल हो गई है, जो कृषि क्षेत्र की उत्पादकता एवं खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव डाल सकती है।
कुल मिलाकर, वर्तमान वैश्विक और घरेलू परिस्थितियां भारत के उर्वरक क्षेत्र की मजबूती के लिए परीक्षण का दौर हैं। विशेषज्ञ और सरकारी अधिकारी दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि बेहतर वित्तीय नीतियां, डिजिटल लॉजिस्टिक्स, और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के माध्यम से इन चुनौतियों का सामना किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में समान संकट से बचा जा सके।



