टेक्नोलॉजी

फसलों के लिए चमगादड़ के मल पोषण को मापने की अपील


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नई दिल्ली: भारत में उड़ने वाले स्तनधारियों पर हाल ही में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, जिसमें किसानों के बीच उनके उपयोग से जुड़े संभावित जैविक खतरों का अध्ययन करने की अपील की गई है। इस रिपोर्ट में चमगादड़ के मल (गुआनो) के दीर्घकालिक उपयोग से सम्बंधित जूनेटिक (zoonotic) रोगाणुओं के प्रसार के जोखिम को समझने पर विशेष जोर दिया गया है।

चमगादड़ का मल पारंपरिक रूप से कृषि क्षेत्र में उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाता रहा है, क्यूंकि इसमें पोषक तत्वों की मात्रा उच्च होती है जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है। भारत के कई राज्यों में गुआनो का उपयोग फल, सब्जी और फसलों की खेती में बड़े पैमाने पर होता है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस मल में मौजूद संभावित रोगजनकों की पहचान कर उनके लंबे समय तक उपयोग से होने वाले जोखिमों पर गहन अध्ययन की आवश्यकता जताई है।

रिपोर्ट के अनुसार, जूनेटिक रोग जंगली जानवरों से मनुष्यों में फैलने वाले संक्रमण हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। चमगादड़ ऐसे स्तनधारी हैं जो कई खतरनाक वायरस जैसे कि निपाह, कोरोना व अन्य जूनेटिक रोगाणुओं के प्राकृतिक वाहक हो सकते हैं। इसलिए, उनके मल के संपर्क में आने वाले किसान और उपभोक्ता जोखिम में रह सकते हैं।

विशेषज्ञों ने कहा है कि गुआनो के पोषण संबंधी फायदे तो प्रमाणित हैं परंतु उसे सुरक्षित रूप से उपयोग में लाने के लिए व्यापक और नियंत्रित शोध की जरूरत है। इसके साथ ही, उन्हें जैव सुरक्षा उपायों को भी अपनाना होगा, जिसमें मल के संग्रहण, परिवहन तथा प्रयोग में सावधानी बरतना शामिल है। इस दिशा में सरकार और कृषि वैज्ञानिक संगठन मिलकर नियमित निगरानी और जागरूकता अभियान चलाएंगे।

हालांकि जूसेटिक रोगों के फैलाव के खतरे को लेकर सावधानियां आवश्यक हैं, वहीं चमगादड़ से जुड़े पारिस्थितिक एवं आर्थिक लाभों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसानों के लिए चमगादड़ के मल की पौष्टिकता का सही आंकलन और जोखिम कम करने वाले उपाय सुनिश्चित करना बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

सरकार के कृषि विभाग ने कहा है कि वे इस विषय पर आगे रिसर्च को प्रोत्साहित करेंगे और साथ ही किसानों को गुआनो के सुरक्षित उपयोग को लेकर निर्देशित करेंगे। अनुसंधान के बेहतर नतीजों के लिए शैक्षणिक संस्थानों, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एजेंसियों और हेल्थ डिपार्टमेंट के बीच सहयोग भी जरूरी बताया गया है।

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारत के उड़ने वाले स्तनधारियों, विशेषकर चमगादड़ से मानव जाति को मिलने वाले लाभों के साथ-साथ सावधानीपूर्वक उनके संबंध में जैविक खतरों को भी समझना उतना ही आवश्यक है। यह कार्य कृषि उत्पादन में सुधार और जन स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा।


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