
बदलते उपमहाद्वीप में नुकसानदेह प्रजातियाँ सही दुश्मन नहीं हो सकतीं
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नई दिल्ली, 27 अप्रैल 2024: विदेशी आक्रामक प्रजातियों (Invasive Alien Species) के व्यापक प्रसार को देखकर कई विशेषज्ञ चिंता में हैं, लेकिन इनके हटाए जाने के पीछे छिपी जमीनी समस्याओं पर ध्यान कम ही दिया जाता है। हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि केवल उन पौधों और प्रजातियों को हटाना ही समाधान नहीं है, बल्कि जमीन की नमी व्यवस्था और मिट्टी के रासायनिक घटकों में आए बदलावों को समझना और सुधारना भी बेहद आवश्यक है।
किसानों और पर्यावरणविदों ने बताया है कि आक्रामक विदेशी पौधों को हटाना अपेक्षाकृत आसान काम है, क्योंकि इसे हेक्टेयरों में मापा जा सकता है। लेकिन ये नहीं देखा जाता कि नमी के पैटर्न में आए बदलाव या मिट्टी की रसायनिक संरचना में हस्तक्षेप कैसे इन पौधों को फलने-फूलने के अनुकूल बना देते हैं। वास्तव में, ऐसे पर्यावरणीय कारक आक्रामक प्रजातियों के विस्तार के प्राथमिक कारण हो सकते हैं।
डॉ. श्वेता सिंह, एक पर्यावरणवादी ने बताया, “जब हम केवल विदेशी आक्रामक पौधों को हटाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम समस्या के जड़ से नहीं निपट रहे होते। हमें उपमहाद्वीप के बदलते जलवायु और पर्यावरणीय तंत्र की समझ को प्राथमिकता देनी होगी। इससे ही हम इन प्रजातियों के प्रसार को नियंत्रित कर सकेंगे।”
विशेषज्ञों का मानना है कि नमी के स्तर में कमी या वृद्धि, तापमान में बदलाव, और मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी जैसे कारण विदेशी प्रजातियों के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, जिस क्षेत्र में मिट्टी की उर्वरता कम हो गई हो, वहां कुछ आक्रामक प्रजातियाँ तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा लेती हैं।
सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं भी इस दिशा में काम कर रही हैं। वे न केवल विदेशी आक्रामक प्रजातियों को हटाने की मुहिम चला रही हैं, बल्कि स्थानीय जलवायु और मिट्टी के रासायनिक अध्ययन पर निवेश कर रही हैं ताकि सही समाधान निकाला जा सके।
इसका सीधा प्रभाव उपमहाद्वीप के कृषि उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता पर पड़ता है। विदेशी आक्रामक प्रजातियाँ न केवल फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि स्थानीय वनस्पति और जीवों का अस्तित्व भी खतरे में डालती हैं। इसलिए विशेषज्ञ अब तेजी से इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि पहले पर्यावरणीय कारकों की गहरी समझ बनाई जाए और फिर रणनीतियाँ विकसित की जाएं।
निष्कर्षतः, विदेशी आक्रामक प्रजातियों को केवल एक शत्रु के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय परिवर्तनों को भी ध्यान में रखते हुए एक समग्र और रणनीतिक दृष्टिकोण लाना होगा। तभी यह संभव होगा कि उपमहाद्वीप का पारिस्थितिकी तंत्र तुलनात्मक रूप से स्वस्थ और संतुलित बना रहे।



