
‘लव इंश्योरेंस कंपनी’ फिल्म समीक्षा: प्रदीप राघनथन की ‘LIK’ चित्रित भविष्यवादी रोम-कॉम ने खोया अपनी धार
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चेन्नई, 2040 की एक नियोन रौशनी से जगमगाती दुनिया में, फिल्म निर्माता विग्नेश शिवन ने एक ऐसी रोमांटिक कॉमेडी पेश की है, जो अपनी कल्पनाशीलता के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है, लेकिन पूरी तरह से अपनी कहानी को दर्शकों के समक्ष प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने में नाकाम रहती है। तमिल सिनेमा के दूसरे हिस्से की उदासी अभी भी अपनी जगह बनाए हुए है, यही कारण है कि इस फ़िल्म की दूसरी छमाही दर्शकों को अपेक्षित उत्साह नहीं दे पाती।
‘लव इंश्योरेंस कंपनी’ नामक इस फ़िल्म में भविष्य की एक फिक्शनल दुनिया का निर्माण किया गया है, जहां प्रेम को बीमा का विषय बना दिया गया है। कहानी के केंद्र में यह विचार बेहद नया एवं रोचक है, जो निश्चित ही दर्शकों की जिज्ञासा को बढ़ाता है। विग्नेश शिवन ने अपने संवाद और दृश्य-निर्माण के माध्यम से इस नए कांसेप्ट को जीवंत करने की काफी कोशिश की है।
फिल्म की शुरुआत तेजी से होती है और पहले कुछ दृश्य दर्शकों को बांधने में सफल होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, विचारों का विस्तार और पात्रों का विकास कमजोर पड़ता जाता है। यह पहलू फिल्म की मुख्य कमजोरी के रूप में उभरता है। कई बार ऐसा लगता है कि नॉस्टेल्जिया और भविष्यमय तकनीक का मिश्रण दर्शकों को उलझा रहा है और कहानी के प्रवाह में बाधा डाल रहा है।
तमिल सिनेमा में आजकल देखने को मिल रही यह प्रवृत्ति दर्शकों के मन में निराशा पैदा करती है। संभावना थी कि ‘लव इंश्योरेंस कंपनी’ इस प्रवृत्ति को बदलने वाली फिल्म साबित हो, लेकिन वह अपने कथानक के मध्य में कमज़ोर पड़ जाती है। हालांकि, कलाकारों का प्रदर्शन कहीं-कहीं प्रशंसनीय है, खासकर मुख्य कलाकारों की केमिस्ट्री ने छोटी-छोटी दृश्यों में खुसुर-फुसुरर रंग उभारा है।
तकनीकी दृष्टि से फिल्म में ग्राफिक्स और सेट डिज़ाइन को काफी ध्यान से तैयार किया गया है, जो भविष्य की झलक दिखाते हैं। परन्तु कथानक की गहराई एवं सशक्त संवादों का अभाव इसे मौलिकता से दूर ले जाता है। संगीत और पृष्ठभूमि ध्वनि भी फिल्म की भावना को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाती है।
सारांश में यह कहा जा सकता है कि ‘लव इंश्योरेंस कंपनी’ एक दिलचस्प कंटेंट के साथ आई है, लेकिन वह अपेक्षित पकड़ और गहराई नहीं बना पाई है। विग्नेश शिवन की कोशिशों के बावजूद यह फ़िल्म तामिल सिनेमा के उस दौर का प्रतिनिधित्व करती है, जहां नवाचार और कहानी के बीच संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है। प्रशंसकों को उम्मीद थी कि यह फिल्म नई सोच को जन्म देगी, परंतु वह उतने प्रभावशाली साबित नहीं हुई।
फिर भी, फिल्म के कुछ हिस्से निश्चित ही मनोरंजन के साथ-साथ विचार करने लायक भी हैं, इसलिए यह देखना रोचक होगा कि आगे आने वाली तमिल फिल्मों में समान प्रकार की कल्पनाशीलता को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाएगा।



