
नासा के उपग्रहों ने महासागरों में बड़े पैमाने पर पोषण तंगी का पता लगाया
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पृथ्वी के महासागर जैसे-जैसे गर्म होते जा रहे हैं, सूक्ष्म समुद्री जीवाणु महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी के कारण अत्यधिक तनाव महसूस कर रहे हैं। नासा के उपग्रह अवलोकनों, महासागरीय सर्वेक्षणों और समुद्री सूक्ष्मजीवों के आनुवंशिक परीक्षणों को मिलाकर किए गए एक नवीन अध्ययन से पता चलता है कि महासागरों में पानी के तापमान में वृद्धि से पोषक तत्वों की उपलब्धता सीमित हो रही है, जो समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को बदल सकती है।
यह शोध, जो 5 जून को ‘साइंस एडवांसिस’ में प्रकाशित हुआ, ने फाइटोप्लांकटन की स्थिति का अनुश्रवण किया, जो महासागरों के खाद्य जाल की नींव होते हैं। शोधकर्ताओं ने सीधे नाइट्रोजन, लौह और फॉस्फोरस जैसी पोषक तत्वों को मापने के बजाय उपग्रहों से प्राप्त डेटा के माध्यम से फाइटोप्लांकटन में कार्बन और क्लोरोफिल के अनुपात के सूक्ष्म बदलावों को ट्रैक किया। क्लोरोफिल की मात्रा कार्बन के सापेक्ष घटने पर यह संकेत मिलता है कि प्लांकटन तनाव में हैं।
नासा के महासागर जीवविज्ञान और जैवरासायनिक कार्यक्रम की प्रोग्राम वैज्ञानिक लौरा लोरेंजोनी ने बताया, “जैसे-जैसे हमारा महासागर बदलता जा रहा है, इसके स्वास्थ्य को दूरस्थ संवेदन अवलोकनों के जरिए निरंतर मापना अत्यंत आवश्यक हो गया है। ये अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि प्लांकटन समुद्री खाद्य जाल की आधारशिला हैं, जिन पर कई आर्थिक गतिविधियां निर्भर हैं।”
शोध टीम ने नासा के ‘एक्वा’ उपग्रह के ‘मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरैडियोमीटर’ (MODIS) सेंसर के दो दशकों के डेटा को विश्वभर के अनुसंधान अभियानों में एकत्रित प्लांकटन नमूनों के साथ जोड़ा। इस संयुक्त पद्धति से वैश्विक स्तर पर फाइटोप्लांकटन के पनपने और संघर्ष करने वाले क्षेत्रों का नक्शा तैयार हुआ।
सबसे अधिक पोषण-संबंधी तनाव उपोष्णकटिबंधीय जायरों में मिले, जो अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागरों के विशाल और स्थिर क्षेत्र हैं। यहां सतह का गर्म पानी नीचे की ठंडी जलधाराओं को ऊपर आने से रोकता है, जिससे पोषक तत्वों की आपूर्ति बाधित हो जाती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन के समुद्र विज्ञानी एडम मार्टिनी ने कहा, “जब महासागर की सतह गर्म होती है तो कम घनत्व वाले गर्म पानी की एक परत ठंडे, उच्च घनत्व वाले पानी के ऊपर स्थिर हो जाती है। यह स्थिति पोषक तत्वों के ऊपर आने को रोकती है।”
दक्षिणी प्रशांत के उन क्षेत्रों में जहां पोषक तत्वों की कमी सबसे अधिक थी, वहां नाइट्रोजन और लौह की कमी के कारण प्लांकटन पर सबसे अधिक तनाव पड़ा। लेकिन उत्तर अटलांटिक में पोषक तत्वों की कमी अपेक्षा से कम पाई गई, जिससे पता चलता है कि वहां के फाइटोप्लांकटन फॉस्फोरस की कमी से आंशिक रूप से निपट सकते हैं।
शोध से यह भी पता चला कि पोषण संबंधी तनाव मौसम और प्रमुख जलवायु चक्रों जैसे एल नीनो और पैसिफिक डीकैडल ऑस्सिलेशन के अनुरूप बदलता है। ला नीना जैसे ठंडे जलवायु प्रभावों में पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ती है और तनाव कम होता है। इसके बावजूद, 2002 से 2021 के बीच महासागरों के लगभग 90% हिस्सों में सतही जल तापमान में वृद्धि और पोषण तनाव में आम तौर पर इजाफा हुआ है।
दक्षिणी गोलार्ध के कई पोषण-गरीब क्षेत्रों में, हालांकि तापमान में वृद्धि हुई, पर पोषण तनाव अपेक्षा से कम बढ़ा। शोधकर्ताओं का मानना है कि हवा से नाइट्रोजन कैप्चर करने वाले माइक्रोबिक जीवन इस कमी को आंशिक रूप से पूरा कर रहे हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में हो सकता है अधिक स्थिरता हो।
ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के जैवरसायनज्ञ माइकल बेहरेंफेल्ड ने बताया, “हमारे पास दो शक्तिशाली उपकरण हैं — उपग्रह अवलोकन और कोशिकीय अध्ययन। एक तरफ हमारे पास सूक्ष्म फाइटोप्लांकटन का विस्तार से डेटा है और दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर उपग्रह डेटा मौजूद है।”
यह नया अध्ययन यह दर्शाता है कि उपग्रहों द्वारा महासागर के व्यापक अवलोकन और प्लांकटन के आनुवंशिक संकेतों को जोड़कर हम पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन के जैविक प्रभावों को लगभग वास्तविक समय में समझ सकते हैं।
लेखक: जेम्स रायडन
नासा अर्थ साइंस न्यूज़ टीम



